यादें कुछ भूली भूली सी..

हो रहा सही , सो रहा अभी,
जो कहा नहीं, सो रहा नहीं,
है वो जगह कहाँ , जाना जहाँ,
वो था कब, जब में भी था वहाँ,
आँखों में स्वप्न अधूरे हैं,
कहने को शब्द न पूरे हैं ,
यादें कुछ भूली भूली सी,
बातें कुछ हैं गोधूलि सी,
कुछ खींच रहा मेरे भीतर,
किस तरह में वहाँ जाऊ पर?
मन को अपने समझाता हूँ,
फिर भी क्यों उधर ही जाता हूँ,
जीवन में आगे बढ़ने को,
किसी और की जंग को लड़ने को,
छोड़ा मैंने जो घर था अपना,
अब लगता है भूला सा सपना,
जो याद बहुत तो आता है,
पर अब उससे कोई न नाता है,
जीवन की राहो में आगे,
एक अंधी दौड़ में थे भागे,
अब जब, सब कर, घर ही बसाना था,
तो फिर छोड़ा ही क्यों वो आसियाना था ?
हो कोई अगर तेरे घर पर,
दे ध्यान अभी इस अवसर पर,
यादें वो न भूली भूली हों,
सूनी न सब गोधूलि हों,
इस कारण जाते रहना है,
घर अपने आते रहना है,

©sarikatripathi
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