मेरी यादों मे आने वाले अजनबी..

कुछ अधूरा लिख कर के मिटा दिया हमने,

तुम्हारे खयाल को कुछ दूर हटा दिया हमने,

ऐ मेरी यादों मे आने वाले अजनबी,

तेरे हिस्सों को आपनी यादों से घटा दिया हमने,

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तेरा चेहरा अब तो निगाहों में धुंधला भी गया,

तुझे सोचने जो था अब वो सिलसिला भी गया,

एक परछाई सी ख़यालों में भले ही रहे,

पर तेरे न होने से जो था अब वो गिला भी गया,

~~

तुझे तेरे होने क्या गुमान थे, अब कुछ याद नहीं,

छोड़ा हमने जो सहर, शायद वो अब आबाद नहीं,

बद्दुआ दी तो ना थी हमने कोई,

फिर भी दोबारा बसाने की अब कोई फ़रियाद नहीं,

~~ ©सरिकात्रिपाठी

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पाठकों का शुक्रिया…. !!

पढ़ते रहिए, खुश रहिए … !!

राजनीति की मुश्किलें..

हाय ये राजनीति की मुश्किलें…….

एक युवा के नेता हो जाने की मुश्किल है,

नैतिकता के पुर्जों को बचाने की मुश्किल है,

आसान होता है, खाली हाथ लेकर जाना,

राजनीति में खाली हाथ रह पाने की मुश्किल है,

हाय ये राजनीति की मुश्किलें…….

राजनीति के दलदल में ज्यूं धसते जाते है,

अपने साथ साथ परिवार भी फसते जाते हैं,

जितना भी चाहे सब सही सही करना,

एक एक गलतियों के फंदे कसते जाते हैं,

हाय ये राजनीति की मुश्किलें…

सिपाही जो देश के लिए सीमा पर लड़ते हैं,

दुश्मन को जानते हैं, देश के लिए मरते हैं,

नेता सही हो तो, अपनों से ही खतरे तमाम,

जान बचाने के लिए फिर क्या नहीं करते हैं,

हाय ये राजनीति की मुश्किलें……

अपराध करना रोज की बात बनी हुई ,

न्याय के कांटे की सुई एक ओर तनी हुई,

सही गलत की बहस रोज होती रहे,

सही न्याय की कमी रोज ही बनी हुई,

हाय ये राजनीति की मुश्किलें……….

वोटरों पर आधारित यह लोकतंत्र होना था,

जनता और देश का कल्याण ही मंत्र होना था,

फिर लोभ और दंभ ने क्यूँ घेर लिया आकर,

जिससे बचने के लिए ही तो स्वतंत्र होना था,

हाय ये राजनीति की मुश्किलें……..

यही है, यही होता है, यही होता रहेगा,

देश इन भ्रांतियों को कब तक ढोता रहेगा?

भ्रष्टाचार समान्य है ये मानता रहेगा और,

आजादी के बाद भी, आजादी को रोता रहेगा?

हाय ये राजनीति की मुश्किलें….

©सरिकात्रिपाठी

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Thanks for reading…

Stay hopeful…stay true…!!!

कोशिशें जिंदगी की…🤞

जिंदगी बेलगाम होती गई, हम थामने की कोशिश करते रहे,

वो छटपटा कर छूटती रही, हम बांधने की कोशिश करते रहे,

वो टूट कर बिखर जाती रही, हम बचाने की कोशिश करते रहे,

वो उड़कर आसमा सजाती रही, हम छुपाने की कोशिश करते रहे,

वो उम्मीद हमसे लगाती रही, हम निभाने की कोशिश करते रहे,

जिंदगी यूँही गुजर जाती रही, हम लड़खड़ाने की कोशिश करते रहे,

वो नाराज होकर जाती रही, हम मनाने की कोशिश करते रहे,

वो बेइंतहा याद आती रही, हम भुलाने की कोशिश करते रहे,

वो लौट कर वापस आती रही, हम भगाने की कोशिश करते रहे,

वो थामे रही फिर भी हमें, हम छुड़ाने की कोशिश करते रहे,

हम नाकामियों में उलझे रहे, वो सुलझाने की कोशिश करने लगी,

हम अंधेरे में खुद को बुझाते रहे, वो जलाने की कोशिश करने लगी,

हम उससे शिकायत करते रहे, वो मुस्कराने की कोशिश करने लगी,

हम कोशिशों से जब हारने लगे, वो जिताने की कोशिश करने लगी,

कोशिशों की हिम्मत फिर जागने लगी, जिन्दगी मेरे आगे नाचने लगी,

जीने का मकसद देते हुए, वो मंजिलों की ऊंचाई नापने लगी,

वो दिखाती रही रास्ते हमें, हम चलते जाने की कोशिश करते रहे,

वो थकाती रही हमें उम्र भर, हम न जाने क्या कोशिश करते रहे,

ऐ जिंदगी शुक्रिया तेरा, तू कोशिशों का एक बड़ा गुलशिताॅ जो बनी,

मेरे होने का इतना सुकून मुझको है, इन कोशिशों की एक दास्ताँ तो बनी,

©सरिकात्रिपाठी

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पढ़ने के लिए शुक्रिया…!!

पढ़ते रहिए, प्रसन्न रहिए..!!

मनीप्लांट सी जिंदगी..!

बोतल में पडी मनीप्लांट सी जिंदगी,

मिट्टी के इंतजार में जैसे रुकी हुई सी,

आशा पकड़े हुए, पर बढ़ भी नहीं रही,

रोशनी की तरफ जैसे थोड़ी झुकी हुई सी,

©सरिकात्रिपाठी

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Stay hopeful..stayalive…!!

और हो क्यूँ…?

इच्छायें छोटी नहीं हैं मेरी, और हों क्यूँ, चलना मुझे है तो मंजिलें भी में ही तय करूँ…

रोशनी कम पसंद नहीं मुझे, और हो क्यूँ, जलना मुझे है तो आग की ऊंचाई भी में ही तय करूँ….!

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फिर कमाया क्या?

सालों नौकरी की, फिर भी नौकरी न छोड़ सके, तो फिर कमाया क्या?

हमेशा आभाव में रहे, फिर भी चौखट न जोड़ सके, तो फिर बचाया क्या?

प्यार बहुत किया, फिर भी साथ ना रहे कभी, तो फिर निभाया क्या?

दिल दुखाया कईबार, फिर भी एक मुस्कराहट ना ला सके, तो फिर मनाया क्या?

पूजते रहे रोज, फिर भी ईश्वर से ना मिल सके , तो फिर मन लगाया क्या?

देते रहे वो हमेशा, फिर भी माता पिता साथ नहीं, तो फिर लौटाया क्या?

दुनिया घूमें बहुत, फिर भी सोच कुंद रही, तो फिर देख के आया क्या?

चलते रहे विमानों में, फिर भी पहुंचे कहीं नहीं, तो फिर उड़ाया क्या?

खाया खूब, फिर भी शरीर कमजोर ही रहे, तो फिर पचाया क्या?

पढ़ाई दिन रात कराए, फिर भी परीक्षा से डरते रहे, तो फिर सिखाया क्या?

लिखते रहे रोजही, फिर भी किसी ने पढ़ा नहीं, तो फिर सुनाया क्या?

अरमान रहे रोज नए, फ़िर भी किया कुछ नहीं, तो फिर पाया क्या?

ज्ञान सबको दिए, फ़िर भी खुद कुछ ना किए, तो फिर कुछ बदल पाया क्या?

शिकायत रही अंधेरे से, फिर भी एक दिया ना जला सके, तो फिर कर दिखाया क्या?

ये जीवन के राशन की दुकान से लाने वाले समान की सूची है, इस लिए अपूर्ण है…!

में आपने जीवन को गौर से देख रही हूँ, कुछ और दिख जाए तो लिख लूँ,….!!

………………….more to come …..

©सारिकात्रिपाठी

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Thanks for reading..!!

Stay healthy, stay happy…

रोजाना (नया 5&6)

वही छुपाना वही दिखाना रोजाना,

वही खाना वही पकाना रोजाना,

परहेज करने को राजी तो हो जाना,

छुप छुप कर फिर वही चुराना रोजाना,

वही नौकरी वही कमाई रोजाना,

वही बहस और वही लड़ाई रोजाना,

दो मिनट का चाय विराम ले पाना,

वही कुर्सी और वही घिसाई रोजाना,

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©सरिकात्रिपाठी

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रोजाना भाग 1 & 2

रोजाना भाग 3 & 4

चीनी का परहेज…..!

चीनी सामान से यूँ ग्राहक को नेह हो गया,

देश की अर्थव्यवस्था को जैसे मधुमेह हो गया,

है लुभावना जैसे किसी मिठाई की तरह,

जिसका लालच छोड़ना है, लड़ाई की तरह,

पर रोग है तो इलाज भी करना ही होगा,

मीठा दिखे फिर भी इससे डरना ही होगा,

स्वदेशी कड़वा हो तो भी उपचार की तरह,

बढ़ाते रहें हम एक दृढ़ विचार की तरह,

जितना संभव चीनी का परहेज ही करें,

धीरे धीरे से फिर देसी परचेज भी करें,

मधुमेह की ही तरह पडोसी नहीं हटा सकते,

परहेज से पर उसका असर जरूर घटा सकते,

जिससे देश का अर्थ स्वास्थ्य अच्छा बन सके,

और सेनिको के घरों की भी दिवाली मन सके,

©सारिकात्रिपाठी


Thanks for reading..!!

Image borrowed from the Internet.

तकनिकी में आभास.. !! #technology vs #feelings

विडिओ कॉल ने बड़ी मुश्किल में डाल दिया,

जुदाई के गम का सारा अर्थ ही निकाल दिया,

वो सामने तो होते हैं, पर दिल भरता तो नहीं,

रोज मिलने जैसा तो है, पर मिलना तो नहीं,

सुबह की चाय और रात का खाना भी यूँ तो साथ है,

पर दोनों के प्याले और थाली में कुछ अलग सी बात है,

पहले के ज़माने में दिल भर के रो तो थे पाते,

आज झूठी खुशी से जैसे खुद को बस बहलाते,

दो नाव में जैसे साथ बहती हुई शाम सजती है,

पर दूर से झरना देखने से प्यास कब बुझती है?

तकनिकी में सुविधा तो है पर सच्चा आभास नहीं,

तात्कालिक साधन तो है, घर वाला एहसास नहीं,

जीवन के इस रूप को सामान्य नहीं कह सकते,

हमेशा तो विडिओ कॉल के साथ नहीं रह सकते… !!!

©सरिकात्रिपाठी


Thanks for reading my poem..!!