समाचार में सच

सच जानने के लिए समाचार सुन रही थी,

समाचारों से मैं, सच के टुकड़े चुन रही थी…

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एक की थी आग, तो दूसरे का पानी थी,

जलाने बुझाने की थी, पर वही कहानी थी,

दृष्टि दृष्टीकोण से सीमित थी, और,

आधी बात ही, सबसे पहले सुनानी थी,

गुणवत्ता समाचारों की यूँही घुन रही थी,

समाचारों से मैं, सच के टुकड़े चुन रही थी…

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सबका सच एक दूसरे से क्यूँ अलग था,

किस्सा वही था, नजरिया यूँ अलग था,

कहीं बचाव, कहीं हानि की कोशिश थी,

सही भी नहीं था कोई न ही गलत था,

साजिशों के जाल ख़बरें बुन रहीं थीं,

समाचारों से मैं, सच के टुकड़े चुन रही थी…

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बुलंद आवाजों से तथ्यों को मार रहे थे,

बहस में अजब बेतुकी बातें झाड़ रहे थे,

कहने को सब विद्वान इकठ्ठा किए थे,

पर मिलके सच्चाई के कपड़े फाड़ रहे थे,

शोर में से सच की कराहें, झुन रहीं थीं,

समाचारों से मैं, सच के टुकड़े चुन रही थी…

समाचारों से मैं, सच के टुकड़े चुन रही थी…

©सरिकात्रिपाठी

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पाठकों का अभिनंदन..!!

राजनीति की मुश्किलें..

हाय ये राजनीति की मुश्किलें…….

एक युवा के नेता हो जाने की मुश्किल है,

नैतिकता के पुर्जों को बचाने की मुश्किल है,

आसान होता है, खाली हाथ लेकर जाना,

राजनीति में खाली हाथ रह पाने की मुश्किल है,

हाय ये राजनीति की मुश्किलें…….

राजनीति के दलदल में ज्यूं धसते जाते है,

अपने साथ साथ परिवार भी फसते जाते हैं,

जितना भी चाहे सब सही सही करना,

एक एक गलतियों के फंदे कसते जाते हैं,

हाय ये राजनीति की मुश्किलें…

सिपाही जो देश के लिए सीमा पर लड़ते हैं,

दुश्मन को जानते हैं, देश के लिए मरते हैं,

नेता सही हो तो, अपनों से ही खतरे तमाम,

जान बचाने के लिए फिर क्या नहीं करते हैं,

हाय ये राजनीति की मुश्किलें……

अपराध करना रोज की बात बनी हुई ,

न्याय के कांटे की सुई एक ओर तनी हुई,

सही गलत की बहस रोज होती रहे,

सही न्याय की कमी रोज ही बनी हुई,

हाय ये राजनीति की मुश्किलें……….

वोटरों पर आधारित यह लोकतंत्र होना था,

जनता और देश का कल्याण ही मंत्र होना था,

फिर लोभ और दंभ ने क्यूँ घेर लिया आकर,

जिससे बचने के लिए ही तो स्वतंत्र होना था,

हाय ये राजनीति की मुश्किलें……..

यही है, यही होता है, यही होता रहेगा,

देश इन भ्रांतियों को कब तक ढोता रहेगा?

भ्रष्टाचार समान्य है ये मानता रहेगा और,

आजादी के बाद भी, आजादी को रोता रहेगा?

हाय ये राजनीति की मुश्किलें….

©सरिकात्रिपाठी

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Thanks for reading…

Stay hopeful…stay true…!!!

और हो क्यूँ…?

इच्छायें छोटी नहीं हैं मेरी, और हों क्यूँ, चलना मुझे है तो मंजिलें भी में ही तय करूँ…

रोशनी कम पसंद नहीं मुझे, और हो क्यूँ, जलना मुझे है तो आग की ऊंचाई भी में ही तय करूँ….!

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Thanks for reading

चीनी का परहेज…..!

चीनी सामान से यूँ ग्राहक को नेह हो गया,

देश की अर्थव्यवस्था को जैसे मधुमेह हो गया,

है लुभावना जैसे किसी मिठाई की तरह,

जिसका लालच छोड़ना है, लड़ाई की तरह,

पर रोग है तो इलाज भी करना ही होगा,

मीठा दिखे फिर भी इससे डरना ही होगा,

स्वदेशी कड़वा हो तो भी उपचार की तरह,

बढ़ाते रहें हम एक दृढ़ विचार की तरह,

जितना संभव चीनी का परहेज ही करें,

धीरे धीरे से फिर देसी परचेज भी करें,

मधुमेह की ही तरह पडोसी नहीं हटा सकते,

परहेज से पर उसका असर जरूर घटा सकते,

जिससे देश का अर्थ स्वास्थ्य अच्छा बन सके,

और सेनिको के घरों की भी दिवाली मन सके,

©सारिकात्रिपाठी


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Image borrowed from the Internet.