समाचार में सच

सच जानने के लिए समाचार सुन रही थी,

समाचारों से मैं, सच के टुकड़े चुन रही थी…

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एक की थी आग, तो दूसरे का पानी थी,

जलाने बुझाने की थी, पर वही कहानी थी,

दृष्टि दृष्टीकोण से सीमित थी, और,

आधी बात ही, सबसे पहले सुनानी थी,

गुणवत्ता समाचारों की यूँही घुन रही थी,

समाचारों से मैं, सच के टुकड़े चुन रही थी…

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सबका सच एक दूसरे से क्यूँ अलग था,

किस्सा वही था, नजरिया यूँ अलग था,

कहीं बचाव, कहीं हानि की कोशिश थी,

सही भी नहीं था कोई न ही गलत था,

साजिशों के जाल ख़बरें बुन रहीं थीं,

समाचारों से मैं, सच के टुकड़े चुन रही थी…

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बुलंद आवाजों से तथ्यों को मार रहे थे,

बहस में अजब बेतुकी बातें झाड़ रहे थे,

कहने को सब विद्वान इकठ्ठा किए थे,

पर मिलके सच्चाई के कपड़े फाड़ रहे थे,

शोर में से सच की कराहें, झुन रहीं थीं,

समाचारों से मैं, सच के टुकड़े चुन रही थी…

समाचारों से मैं, सच के टुकड़े चुन रही थी…

©सरिकात्रिपाठी

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पाठकों का अभिनंदन..!!

मेरी यादों मे आने वाले अजनबी..

कुछ अधूरा लिख कर के मिटा दिया हमने,

तुम्हारे खयाल को कुछ दूर हटा दिया हमने,

ऐ मेरी यादों मे आने वाले अजनबी,

तेरे हिस्सों को आपनी यादों से घटा दिया हमने,

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तेरा चेहरा अब तो निगाहों में धुंधला भी गया,

तुझे सोचने जो था अब वो सिलसिला भी गया,

एक परछाई सी ख़यालों में भले ही रहे,

पर तेरे न होने से जो था अब वो गिला भी गया,

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तुझे तेरे होने क्या गुमान थे, अब कुछ याद नहीं,

छोड़ा हमने जो सहर, शायद वो अब आबाद नहीं,

बद्दुआ दी तो ना थी हमने कोई,

फिर भी दोबारा बसाने की अब कोई फ़रियाद नहीं,

~~ ©सरिकात्रिपाठी

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पाठकों का शुक्रिया…. !!

पढ़ते रहिए, खुश रहिए … !!

राजनीति की मुश्किलें..

हाय ये राजनीति की मुश्किलें…….

एक युवा के नेता हो जाने की मुश्किल है,

नैतिकता के पुर्जों को बचाने की मुश्किल है,

आसान होता है, खाली हाथ लेकर जाना,

राजनीति में खाली हाथ रह पाने की मुश्किल है,

हाय ये राजनीति की मुश्किलें…….

राजनीति के दलदल में ज्यूं धसते जाते है,

अपने साथ साथ परिवार भी फसते जाते हैं,

जितना भी चाहे सब सही सही करना,

एक एक गलतियों के फंदे कसते जाते हैं,

हाय ये राजनीति की मुश्किलें…

सिपाही जो देश के लिए सीमा पर लड़ते हैं,

दुश्मन को जानते हैं, देश के लिए मरते हैं,

नेता सही हो तो, अपनों से ही खतरे तमाम,

जान बचाने के लिए फिर क्या नहीं करते हैं,

हाय ये राजनीति की मुश्किलें……

अपराध करना रोज की बात बनी हुई ,

न्याय के कांटे की सुई एक ओर तनी हुई,

सही गलत की बहस रोज होती रहे,

सही न्याय की कमी रोज ही बनी हुई,

हाय ये राजनीति की मुश्किलें……….

वोटरों पर आधारित यह लोकतंत्र होना था,

जनता और देश का कल्याण ही मंत्र होना था,

फिर लोभ और दंभ ने क्यूँ घेर लिया आकर,

जिससे बचने के लिए ही तो स्वतंत्र होना था,

हाय ये राजनीति की मुश्किलें……..

यही है, यही होता है, यही होता रहेगा,

देश इन भ्रांतियों को कब तक ढोता रहेगा?

भ्रष्टाचार समान्य है ये मानता रहेगा और,

आजादी के बाद भी, आजादी को रोता रहेगा?

हाय ये राजनीति की मुश्किलें….

©सरिकात्रिपाठी

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Thanks for reading…

Stay hopeful…stay true…!!!

ये कैसे हिन्दोस्तानी

ये कैसे हिन्दोस्तानी हैं, जो हिन्दोस्तान को जाला रहे,

न सुनते कुछ न ही समझते हैं , वस यूँही चिल्ला रहे,

पत्थर को हाथो में लेकर, शांतिपूर्ण विरोध में आते हैं ,

इनका धेय कुछ और ही है, धेयहीन को भड़काते हैं,

चाहिए इनको रक्षा भी, और रक्षक पर पत्थर फेंक रहे,

इनके पीछे से घड़ियाल कई , अपनी रोटियां सेंक रहे,

अज्ञान में भरकर असंतोष, विरोध में हिंसा लाते हैं,

उनका न देश न धर्म कोई, जो हिंसा को सुलगाते हैं,

रक्त गिरा देश का, देश की ही सम्पति की हानि है ,

हिंसक विरोध करने वाले, ये कैसे हिन्दोस्तानी हैं?

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From the heart of an affected Indian.

#peace

Thanks for reading… !!